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Sunday, 26 February 2012

संध्या

लिए  गर्भ में भोर का अंकुर 
रजनी से मिलने को आतुर 
श्रम की लाली से आलोकित 
सूर्य  रश्मि पर आती संध्या
पल  पल ढलती जाती संध्या

दीप जलें जब शिव आलय में
उठे     नाद  डमरू के  स्वर में 
वेद  मन्त्र  नभ में जब गूँजे 
भक्ति भाव फैले  कणकण में 
तब  प्रभु के पावन चरणों में 
शीश    झुकाए  आती संध्या  

स्वेद बिंदु को पौछ  श्रमिक जब
 अपने   अपने   घर   को   आते  
कल्  रब   गान   सुनाते    पंछी  
तरु   की  फुनगी  पर  आ जाते 
तब   पैरों  में  पहन  के  पायल   
घुंगरू   को  छनकाती  संध्या  
  
जैसे    कोई     स्वप्न     सुंदरी    
उठा   के  घूँघट  झाँक  रही  हो    
अलसाई    बोझिल  अंखियों से     
प्रीतम   का  मुख  ताक रही हो   
सराबोर    हो    प्रेम   रंग    में     
 दुलहन    सी   शर्माती   संध्या    

जीवन  पथ  के  अंतिम  क्षण  में   
एकाकी   जब   मन   हो   जाता     
थकित    जीर्ण  काय   को  ढोता      
स्मृतियों    के     दीप   जलाता       
 चला   चली   की   इस  बेला में      
निष्ठुर   सी   हो   जाती  संध्या 

ममता                                   




Thursday, 23 February 2012

जब भोर हुई





जब   भोर    हुई
 सूरज    निकला ,
नभ    मे  फैली
  वो    अरुणाई  |
टेसू   महके ,
,चिडियाँ  चहकें ,
धरती  पर  छाई  तरुनाई |

सर  पर  गागर   ले,
 जल   भरने |
चल   पड़ी  गुजरिया ,
बल   खाती |
ये   शीतल  मंद
पवन  बहती   ,
और   डाल  डाल
 को छू जाती

लो   चाक   चला   ,
कच्ची   मिटटी
लिपटी  कुम्हार   के
हाथों     मे |
आकार  मिला, 
बन  गयी   दिया ,
जलने को
 काली रातों मे |

काँधे   पर  हल
 लेकर  किसान   ,
बैलों    के   बंधन
खोल   रहा  |
बज   रहीं  घंटियाँ
छनन    छनन ,
स्वर  गलियारे   मे
डोल रहा  |

सरसों   की   कलियाँ
झूम  रहीं  ,
पीले   रंग  की
 चादर  ओढ़े |
भवरों की गुनगुन
 स्वर लहरी ,
कानों    मे मीठा  रस  घोले |

सूरज की परछाई  जल मे ,
रंग झिलमिल  झिल मिल
घोल   रही |
सतरंगी  किरने   कानों  मे ,
कुछ  गुपचुप   गुपचुप
बोल   रहीं|

तुम  भाप  बनो
और   उड़  जाओ ,
पहुचो  नभ   की
ऊंचाई    पर  |

फिर  बादल  की
 बौछार  लिए ,
छम   से   बरसो
इस  धरती  पर |

नदियों   मे पानी
तुम  भर दो |
इस   धारा   को
धानी  तुम  कर  दो |
धीरे धीरे  लाओ बसंत,
ये  सुबह  सुहानी
तुम कर दो |

ममता

Wednesday, 25 January 2012

प्रजा तंत्र

मैं   पूछ  रही  दिल्ली  तुझ से,                  गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाओं के साथ
 ये  प्रजा  तंत्र  अब  चला  कहाँ ?  

सच्चाई   पर   हैं   सौ   पहरे
बेईमानी का  कोई  जिक्र  नहीं |
पल  रहा  ह्रदय  में  भ्रष्ट  तंत्र ,
अपनों   की   कोई  फिक्र  नहीं |

बस फिक्र सदा है निज हित की ,
इतिहास  घिनोना  रचा    यहाँ |
मैं  पूछ  रही  दिल्ली    तुझसे ,
ये प्रजा तंत्र  अब चला   कहाँ ?

जिस   सिहासन  पर  बैठे हो
  ये   शायद   तुमको  याद  नहीं |
ये  ताज   हमीं  ने  पहनाया
वर्ना  कोई    औकात    नहीं |

पर  रुको  तनिक  ठहरो  देखो ,
सब पोल  तुम्हारी  खुली  यहाँ |
मैं  पूछ  रही  दिल्ली  तुझ से ,
ये  प्रजा  तंत्र  अब चला  कहाँ ?

 पहले  शब्दों   के  हेर   फेर ,
फिर  सम्मोहन  के  वादे   हैं  |
पर  तुमको सारा  जग    जाने ,
कैसे     नापाक   इरादे   हैं |

हर  बात   तुम्हारी   घातों  की,
छल छिद्र  कपट सब पला  यहाँ |
मैं  पूछ  रही   दिल्ली   तुझसे ,
ये प्रजा  तंत्र  अब  चला   कहाँ ?

         ममता  बाजपेई



Saturday, 21 January 2012

जीवन है तो चिंताएं हैं

जीवन   है    तो    चिंताएं   हैं ,
ये  सिक्के   के   दोनों    पहलू |
तुम   कहो   तुम्हारी     चिंताएं
अपनी   चिंताएं   मैं   कह    लूँ |

एक   दूजे   को   संबल  दे  दें ,
हौसला    बढ़ाएं    हम   अपना |
सह सको  व्यथा  तुम   जीवन की
अपनी   पीडाये   मैं   सह   लूँ |

मन   हल्का  कर लें  कह सुन कर
कुछ  भार  हिया  का  कम  तो हो|
 उँगली    थामे    उम्मीदों    की ,
पगडण्डी   एक   नयी   गह    लूँ |

कुछ    कड़वी   तीखी      बोछारें
कुछ    खारे    पानी   की    बूंदे |
मिल  एक  लहर    सी बन   जाऊं
फिर  लहरों   के  संग  संग  बह लूँ



Monday, 2 January 2012

सागर मे भटकी कश्ती

             सागर में भटकी सी कश्ती ,
            जा लगे किसी भी इक तट पर ,
           बस .....ऐसा  ही है ये जीवन!

             कब कहाँ कौन सा मिलेगा तट ,
              ये नहीं हमारे हातों मे \
             जो मिल जाए सो मिलजाए ,
            बस परमेश्वर के हातों में |
             हम अपनी  उर्वर साँसों से ,
            फिर महकाते हैं उस तट को |
            इक नन्हा  बीज लिए कर में ,
              जीवन  देते पूरे  बट को |
          अब इसी तले हम बस जाते ,
            रोते  धोते   हँसते   गाते |
            सपने   बुनते  बातें  गुनते ,
            अपने  तेरे  नाते     चुनते |
           बस यही ठाँव फिर बन  जाता ,
            ये तट अपना  घर  कहलाता |
              पर प्रश्न  सदा ही मन  में  हैं

           यदि....तट हम स्वयं  कभी  चुनते ?
             तो बात और ही कुछ होती |
             हम चुनते सारे सपनों को .......
               हम चुनते सारे अपनों को .......
      

             क्यों सहते कटने  की पीड़ा ...
              हम रहते सबसे मिले जुले ...
             ...
              पर क्यों कटने  की रीति बनी ?
             इस घर से कट के उस घर में .....
              क्यों जाने की है मज़बूरी .....
             क्या ये संभव है नहीं कभी ?
               हम जुड़ते  बस जुड़ते जाते ....
              जुड़ते जुड़ते जुड़ते जुड़ते ....
               बट वृक्ष  बड़ा सा बन जाते .....

ममता


Thursday, 29 December 2011

जीवनसंघर्ष

    जीवन    संघर्ष  ,
 जीवन    संघर्ष |
 दुर्गम    है   रास्ता  ,
 चलता    तू   रह    सदा  |
 धेर्य    की   प्राचीर   चढ ,
 क्या    करेगी   आपदा ?
  पर्बत   भी    देखेंगे   तेरा  उत्कर्ष |
  जीवन   संघर्ष ,
  जीवन   संघर्ष |
  कर्म    ही   आधार है ,
 कर्म   कर   सत्कर्म   कर |
    आएगी   ही   बसंत ,   
  दीप    तैयार   कर  |
   उल्लसित   हो   मना   नव  वर्ष |
  जीवन   संघर्ष ,
  जीवन   संघर्ष |
  भूल    बीती   बातों   को ,
   नए   पल   पुकार  ले |
अनुभवों    की   धूप   से ,
आज   को  सवांर   ले
नित   नए   देख   सपने सहर्ष
जीवन   संघर्ष ,
जीवन   संघर्ष |
थकना   नहीं   रुकना    नहीं ,
चलता   तू   रह    सदा |
पोंछ    श्रम    के   बिंदुओं   को ,
भाल   पर   टीका   लगा |
निश्चय  ही  होगा  विजयी  स्पर्ष |
जीवन   संघर्ष ,
जीवन   संघर्ष |


ममता

Saturday, 24 December 2011

तुम   कहो    तो ,
मैं    तुम्हे   अपना   बना   लूँ  ,
तुम   कहो   तो |

नाप   लूँ    गहराइयाँ   मैं   ,
डूब    कर   सागर   के   जल  में ,
तुम   कहो   तो   शीप   में  ,
मोती   सजा    लूँ ,
तुम कहो तो |

ग्रन्थ   बाँचू 
 या  कि   कोई ,
व्याकरण   का   छंद   गाऊं ,
तुम  कहो   तो ,
 गीत   कोई    गुनगुना   लूँ ,
तुम कहो तो |

दूँ   निमंत्रण   चाँद  को मैं ,
आ   जरा   नीचे  तो   आ
तुम  कहो तो ,
चांदनी   मे   मैं   नहा  लूँ
तुम  कहो तो |

जान  पाओगे  नहीं   तुम ,
है   ये   क्या   जादूगरी ,
तुम   कहो   तो ,
तुम  को  ही  तुम  से चुरा लूँ  |
तुम कहो तो |

तेरे   काँधे   सर   टिका  कर   ,
बात   कुछ  मन  की  कहूँ  ,
तुम  कहो  तो ,
वर्ष  नूतन  ये   मना  लूँ ,
तुम   कहो  तो |

Wednesday, 30 November 2011

चूडियाँ

मैंने  अक्सर  लोगों  को कहते सुना है
कि चूडियाँ  पहन  कर घर में  बैठो
मतलब आप में साहस की कमी है
अर्थात  चूडियाँ  पहनने वाले हाथ बहुत
कमजोर होते है ...पर में इससे सहमत नहीं
इसके जवाव  मे ही मैंने ये रचना लिखी है



चूडियाँ   निर्बल  नही  हैं, शक्ति  है   ये  चूडियाँ |
नारी    का   श्रंगार  है ,सम्मान   हैं  ये चूडियाँ |

पहनती     माँ    शारदा  ,
जब  चूडियाँ निज हाथ में|
दीप  बन  जाती   अँधेरी ,
काली   काली  रात    में|
थाम  कर ऊँगली दिखाती हैं
तुम्हें   पथ   ज्ञान   का
बुध्धि,  बल  ,ममता   दया   का  दान है ये चूडियाँ
नारी   का   श्रंगार   हैं  सम्मान  हैं  ये   चूडियाँ 

सजती  थी   ये झांसी  की ,
वीरंगना   के  हाथ    मे |
नाम अंकित  कर गई  जो ,
शक्ति  का  इतिहास   में|
देश  के  इतिहास  के पन्ने ,
पलट   कर    देख  लो |
ललनाओं  के  हाथ मे  शमशीर  थी  ये चूडियाँ |
नारी  का  श्रंगार  है  सम्मान  हैं   ये चूडियाँ |

माँ   भवानी  के न  जाने ,
कितने    सारे   रूप   हैं |
हैं  कही  पर  छाव  जैसी  ,
और  कही  पर धूप   हैं |
युद्ध   के    मैदान    मैं,
पहुची लिए तलवार जब ,|
राक्षसों    के   रक्त   का  नित  पान  करती चूडियाँ
नारी   का   श्रंगार  हैं   सम्मान  हैं   ये   चूडियाँ 

माँ  बनी  बेटी बनी  और,
प्रियतमा    भी बन गयी  |
प्रेम का  बंधन  ह्रदय की,
भावना   भी  बन  गयी |
तुम  इन्हें  कच्ची  न समझो
हैं  भले  ये    कांच  की
वक्त  आने पर  बदलती  रूप   हैं  ये चूडियाँ |
नारी  का  श्रंगार  हैं   सम्मान  हैं  ये चूडियाँ |

राष्ट्र  की  सर्वोच्च  सत्ता ,
पर  भी  ये  सजती   रहीं |
रक्त  बेटों  का   समर्पित ,
राष्ट्र   को   करती   रहीं
देश   पर   शंकट   अगर    आ  जाये   तो
हँसते  हँसते   देश  पर   कुर्बान   हैं   चूडियाँ
नारी  का   श्रंगार   हैं  सम्मान  हैं  ये  चूडियाँ

Monday, 28 November 2011

आदमी

ओड़ कर चादर दुखों की
 चिंताओं के बोझ  की
चल रहा है आदमी
ओर अंतस मैं सुलगती
 दंभ की इस आग मैं
जल रहा है आदमी
दाह की पीड़ा भयंकर
टीस मन मैं झेलता
पल रहा है आदमी
जाने किसकी चाह है
चाह मैं जिसकी निरंतर
गल रहा है आदमी
मोहनी मीठी जुबां से
जाल सब्दों के बिछा
छल रहा है आदमी
भावनाये हैं तिरोहित
होले होले यन्त्र मैं
ढल रहा है आदमी
तन हुआ बूढा बहुत तो
अपने ही घर द्वार को
खल रहा है आदमी
वक्त की ठोकर लगी तो
हडबडा कर आँख अपनी
मल रहा है आदमी

Friday, 25 November 2011

अक्षर अक्षर जोड़ के ...

                    अक्षर  अक्षर  जोड़  के  देखो
                    शब्द   कई   बन   जाते  है
                    येही  शब्द  ओठों  पर आ कर
                    भाव   व्यक्त   कर  जाते  है


                    शब्दों  का  वजूद  अक्षर से
                    अक्षर  की  ताकत  है शब्द 
                    है इसमें  सन्देश  निहित ये
                    मिलके  साथ रहें  हम सब 

                   गुंथ जाते  है एक  साथ  तब
                   ग्रन्थ  नए   बन   जाते है
                   यही शब्द ओठों पर आ कर
                   भाव व्यक्त  कर  जाते  है

                  शब्दों  की अपनी  दुनियाँ है 
                  है  इन  का  अपना  संसार
                  प्रेम , घृणा ,मद ,लोभ ,मोह
                  इनके अपने  अगणित उदगार
                
                  अभिव्यक्ति   का  जरिया है 
                  ये  मन  का हाल  बताते है
                  यही शब्द ओठों पर आ कर
                  भाव  व्यक्त  कर जाते  है

                  एक  शब्द '' मंथरा   ''बना
                  तो रची गयी  एक'' रामायण ''
                  द्रुपद '' सुता'' का एक शब्द ही
                  बना  युद्ध  का एक  कारण
                

                 तौल मोल  शब्दों को बोलो
                 ग्यानी    लोग  बताते  है
                 यही शब्द ओठों पर आ कर
                 भाव  व्यक्त कर  जाते  है

Thursday, 10 November 2011

औरों पर आरोप लगाना

औरों   पर  आरोप  लगाना , 
कितना  सहज  सरल   होता   है /
बात   निराली   तो  तब   होगी ,
कोई   काम   कठिन   कर   देखो /
अपने   अंतस  मैं  तुम  झांको ,
और   खँगालो   उन   पन्नों   को  /
जहाँ   लिखे   हैं  द्वेष   द्वन्द   सब ,
मन   से   उन्हें   विलग   कर   देखो  /
क्यों   पाली   इतनी   शंकाए  ?
क्षीर   नीर   से    धवल   ह्रदय   मैं  ,
विश्वासों   के  भाव   जगा  कर  ,
जीवन   निश्छल   सा   कर   देखो  /
ये   जीवन   जितना   दुष्कर   है  ,
उतना   ही   ये   सहज   सरल   है  /
बस   लेकर    पतवार    प्रेम   की ,
सागर    पार  उतर   कर   देखो  /
चाह   नही   है   ताजमहल  की ,
दुनियाँ    की   परवाह   नहीं   है /
बस   मेरे   दिल   के  आँगन    मैं  ,
अपना   महल  बना  कर   देखो /
अपने   दुःख   मैं  सबकी   आँखे  ,
बन   जाती  सैलाब   नदी   का  /
एक  बार ,  बस   एक  बार ,  तुम 
दुःख   औरों   का  सुन  कर   देखो  /
अधरों    पर   मुस्कान   खिले  ,और
झरने   लगें   खुशी   के  मोती  ,
झूम   उठे  '' ममता ''  की    लहरें  /
ऐसी   एक   पहल   कर  देखो  /

Sunday, 6 November 2011

क्या लिखू

मैं सोचती हूँ कुछ लिखूँ
पर क्या लिखूँ कैसे लिखूँ
वो कोनसे अल्फाज लूँ
जो आज की कविता लिखूँ 
हलचल सी कुछ मन में  हुई
और शब्द भी सजने लगे
गुमसुम सी इस कलम के
हाथ  भी  चलने  लगे
फिर भाव ने आकार कलम की
उँगलियाँ भी थांम ली
तब ह्रदय ने शब्द  चुन कर
पंग्तियाँ कुछ  बाँध  ली
अब प्रश्न मन ही मन उठा
क्या काव्य की सरिता लिखूँ
मैं सोचती हू कुछ लिखूँ .........
मैं सोचती हू अब लिखूँ
किस शब्द के संसार पर
रूप पर श्रंगार पर या
दुःख के अम्बार पर
टूटते नाते लिखूँ या
फूटते आँसू लिखूँ
मैं  सोचती हू कुछ लिखूँ .......
पल  रहा तूफान है
और चल रहीं हैं आंधियां
जल रही बारूद है
और दूर तक हैं सिसकियाँ
जाने कब चोराहा सुलगा
राख गलियां भी हुई
गोद फिर उजड़ी कई और
माँग भी सूनी हुई
मो़त का मंजर लिखूँ  या
आग का दरिया लिखूँ 
मैं सोचती हू कुछ लिखूँ  .........
सोच कर देखो जरा
क्यों मजहबों की जंग है
एक् सा सबका पसीना
एक लहू का रंग है
एक कतरा भी लहू का
तुम यहाँ गिरने न दो
एक मोती भी किसी की
आँख से झरने  न दो
छोड़ दो सब नफरतें
और तोड़ दो इस जंग को
प्यार से मिल बैठ कर
फिर प्यार की कविता लिखू

Friday, 4 November 2011

माँ तेरे जाने के बाद

माँ  तेरे    जाने    के   बाद  ,
एक   दिन  मैं  ,
घर   गई   थी  /
गाँव    सूना   सा   लगा ,
सुनसान   सी   तेरी 
गली    थी  /
मौन   तेरे   द्वार   पर ,
वो  नीम   की  ,
डाली    खड़ी   थी /
बीच  वाली   माटी   की ,
दीवार   थी  जो  ,
बिन   तेरे   बीमार  सी  ,
बिखरी  पड़ी  थी /
बंद  थी  खिडकी  सभी ,
 और  द्वार  भी /
राह   तकती   द्वार  पर  ,
अब  तू   न  थी /
माँ   तेरे  जाने   के  बाद ..........

झाँकने   जब   मैं  लगी  ,
वो  द्वार  ,खुद  ही   खोल  कर
वो   मेरे  बचपन  का
आँगन   ,
मिलने   आया   दौड  कर /
दूर   कोने  में   खड़ी  थी  ,
अब  भी   मेरी  स्मृति  /
मोंती,   माला , कुछ   किताबें ,
गंध  सी   सोंधी   बसी /
एक   आले  मैं   पड़े  थे  कुछ ,
पुराने   से  दिए  ,
तेल  देती  बातियों   को ,
रौशनी   सी  तू   न  थी /
माँ  तेरे   जाने   के  बाद .........

घूर  कर  ये  पौर  भी  ,
मुझको  लगी  अब ताकने  /
बाद  मुद्दत   कौन ? आया ,
मेरे    अंदर  झाँकने /
हो वही  तुम  लाडली  ?जो थी ,
कभी   खेली  यहाँ  /
अब  बताओ   पास  आकार  ,
थी   अभी   तक  ,
तुम  कहाँ  ?
इतने  दिन  तक  याद  क्या  ?
तुमको   कभी  आई  नहीं /
व्याह  कर  जो  तुम  गई  तो ,
लोट   कर  आई  नहीं /
ओठ  पर  ढेरों  उलाहने  ,
आँख  मैं  उसके  नमी  थी /
माँ तेरे  जाने के बाद .......
जोड़  कर  छाती  ह्रदय  से  ,
पाट  चक्की  के  मिले  /
आँखों  ही  आँखों  मैं कुछ ,
उसने किये  सिक वे  गिले/
थाप  हल्दी  के  पुराने  थे ,
  अभी  भी  भीत  पर /
भारी  मन  से  जो  लगाये  थे ,
विदा  कि  रीत  पर /
हाथ  गालों   पर  टिकाये ,
कह  रही  थी  ओखली  /
आ गई ? मेरी  सहेली ,
नटखटी  सी  चुलबुली /
थी वही तुलसी ,वही लोटा  दिया ,
और  आरती  /
जल  चढाती   ओटले मैं  ,
तू  न थी /

माँ  तेरे  जाने  के  बाद .......



 

माँ

तस्वीर   से   झाँकती
    तुम्हारी   आँखे ,
मुझसे   पूछती   है ,
कैसी    हो ?
  मेरी बेटी /
और  मैं    हो  जाती   हूँ
व्याकुल /
फिर   तुम  बिखरा    कर
ओठों   पर 
मुस्कान ,
देती   हो  मुझे   संबल /
समझाती   हो ,
जीवन   के   रहस्य /
बिलकुल   वैसे  ही ,
जैसे   बचपन   मैं ,
थाम   कर
मेरी   ऊँगली  ,
सिखाया   था  तुमने   चलना /

मैं   करती    हूँ  प्रश्न,
तुमसे   कई   बार /
ऐसी    भी   क्या ?  जल्दी   थी  /
अभी  तो  अधूरी   थी कई   बातें /
कम   से  कम  ,
मेरे   लिए  ,
कुछ   दिन   और  ठहरती /
जब  मैं  अपने ,
मातृत्व    को   समेंट   कर ,
बेटी  को   करती  बिदा ,
तब  केवल  तुम  ही ,
समझ   सकती   थी  ,
मेरी   व्यथा /

तब   थाम   कर  मेरा  हाथ   ,
समझाती   ये   बात  ,
कि   बिछडना   तो  ,
जीवन   की   नियति    है
पर  ये  न  हो  सका /
समय   से  पहले  ,
बिछड   कर ,
टूट  गया   है  मेरा   संबल /
अब  मैं  अकेली ,
कैसे   सम्हालू
दुनियाँ   के  डरावने    छल /
कभी  चलती   हू /
कभी  लडखडाती  हू /
सारी   शक्ति    समेट कर ,
खड़ी   हो   जाती   हूँ /
और   करती  हूँ  ,
दुनियाँ   से  लड़ने  की   तयारी /
सच  कहती  हूँ ,  '' माँ ''
इन   पलों   मैं  ,
बहुत    याद   आती  है ,
तुम्हारी ....../
 



Thursday, 3 November 2011

वो हाथ पोंछ कर आँचल से

वो    हाथ    पोंछ    कर    आँचल     से ,
बर्तन    को    करती     इधर     उधर /
चावल     की      हांडी      खाली      है ,
विपदा     से   जाती  सिहर     सिहर /

आँखों    मैं     बस     इतना     सपना ,
वो       थोड़ा       अन्न      कमाएगी   /
ये     महगाई     जब    कम     होगी ,
वो    जी     भर     खाना      खायेगी  /

नित       सुबह      सबेरे     उठती   है  ,
टुकड़ों      टुकड़ों       मैं      बटती   है /
बस     भूक     मिटाने   की    खातिर ,
दिन    भर     मजदूरी     करती    है  /

महंगी      लगती      रुखी       रोटी  ,
तो    साग     कहाँ      से    खायेगी  /
ये    महगाई     जब     कम   होगी ,
वो    जी    भर      खाना     खायेगी  /

तन    मैं   पल   रहा    है  जो  अंकुर ,
वो     भीतर    तकता    टुकुर   टुकुर /
मींठे       मींठे      सपने       लेकर ,
बाहर      आने      को     है    आतुर 

माँ    की     ममता    भी    राह    तके ,
लालन     को      गोद      खिलाएगी /
ये     महगाई      जब   कम     होगी ,
वो    जी     भर    खाना      खायेगी /

फिर   चिंता    से    होकर      आतुर ,
वो    चुप चुप    अश्रु     बहाती      है /
इन    बूंदों     से     आँखे     धो    कर ,
अपने     मन    को     सहलाती    है/

जीवन    के     सरे   दुःख   सह   कर,
साहस     का       दीप       जलाएगी /
ये      महगाई   जब     कम     होगी,
वो     जी    भर     खाना    खायेगी /

Wednesday, 2 November 2011

ये जिंदगी का है सफर

कौन   मिल  जाए  यहाँ
इस  राह  में,
इस  मोड  पर
ये  जिदगी  का  है  सफर/
पर   है  सफर  ये  कौन  सा?
क्या  जानता   है?
 कोई   भी /
पहचानता   है ? पथ  को   भी/
किस   रास्ते  ?
 किस  मोड  पर  ?
मुड़ना  पड़े,  या  फिर  कहीं
रुकना  पड़े/
कितना  अनिश्चय  है  यहाँ,
इस  राह मैं  /
ये  जिंदगी  का है  सफर /

  है  ये  सफर
  अनजान    सा   , बिलकुल
  अपरचित/
  अनकहा    और
  अनसुना    संवाद    सा/
पर    कौन   सा   ?  संवाद  है  ये /
क्या   परस्पर    बात  है ?
और    बात    है
 तो    कौन    सी  ?
किसने    कही    ?
किसने    सुनी   ?
इस    राह    मैं
कौन  मिल  जाए  यहाँ ,
ये  जिंदगी  का  ह  सफर /

है    ये    सफर
  एक    प्यास    सा  /
पर    प्यास   है    किस    चीज     की ?
क्या    किसी    अहसास    की  ?
या  जटिल    मन   की 
गहन    गहराइयों    मैं
पल    रही    एक 
आस   की/
कौन    जाने    है     ये   क्या  ?
इस  राह  मैं ,
ये  जिंदगी  का है  सफर/

ये   सफर
  एक   चाह  है /
पर    चाह    है    ये     कौन    सी ?
अपने     करों      मैं
थाम     लूँ/
इस    जिंदगी    की     बूंद     को  /
 फिर    बंद     कर    लूँ  मुठ्ठियाँ 
  और    कैद    कर    लूँ
जिंदगी    के    सारे    पल  /

और    राज    समझूँ    जिंदगी   के,
इस  सफर  के/ 
क्यों  मिले ?  कैसे  मिले ?
हम  सब  यहाँ /
इस  राह मैं,
इस  मोड  पर, 
ये  जिंदगी  का है  सफर /

आदमी

ओड़   कर   चादर   दुखों    की
 चिंताओं    के     बोझ      की  ,
चल      रहा    है       आदमी /
ओर    अंतस     मैं  सुलगती
 दंभ     की    इस    आग   मैं,
 जल     रहा      है    आदमी /
दाह    की   पीड़ा    भयंकर
टीस    मन    मैं     झेलता ,
पल    रहा     है       आदमी /
जाने    किसकी    चाह    है ?
चाह   मैं   जिसकी    निरंतर ,
गल     रहा    है    आदमी /
मोहनी    मीठी    जुबां   से
जाल    सब्दों    के    बिछा ,
छल    रहा   है    आदमी /
भावनाये    हैं    तिरोहित
होले     होले    यन्त्र    मैं ,
ढल   रहा    है      आदमी  /
तन   हुआ   बूढा  बहुत तो
अपने   ही   घर द्वार  को ,
खल   रहा     है   आदमी /
वक्त   की   ठोकर   लगी तो
हडबडा कर   आँख  अपनी ,
मल   रहा    है    आदमी /

Tuesday, 1 November 2011

रेत के महल सा

रेत   के  महल   सा   ढह   गया   वो   सपना /
जो   मैंने   देखा   था
अधखुली   आँखों   से
कच्ची   नींद   मैं  /
पथरीली   नुकीली
चट्टान    सी
सामने   थी   सच्चाई  /
बेखोफ   बेरहम
चिलचिलाती    धूप    सी  /
और   चढ   कर
पहुचना    था   शिखर   तक   /
लहराना   था
परचम   भी   अपनी    विजय    का  /
चढते    चढते
पैर   थक    गए   हैं
लथपत   हैं   खून   से  /
थामकर   उम्मीद   का   दामन
चढ   रही   हूँ    अनवरत  /
कभी    तो ?
कहीं   न   कहीं  ?
कोई   मिलेगा ,  जो   समझेगा
मेरे   सपने   को  /
और   बढाएगा   अपना   हाथ
मदद   के   लिए   /
बस   उसी   क्षण   का  है   इन्तजार ,
ऐसे   ही   किसी   खास   को
सोंप   दूँ
दिल   का   टुकड़ा
मैं   फिर   देखती  हूँ   सपना     एक बार /

Saturday, 29 October 2011

चेहरे पर चेहरा

चेहरे  पर  चेहरा  /
आवरण   सुनहरा  /
ढक   रहे  विद्रूप  को /
ओढ़   नकली  रूप  को   /
हम  यहाँ  पर   जी  रहे  /
चमचमाते   रूप   से  ,
 सम्मान का रस पी रहे  /
और   खुल   न  जाए
पोल  कोई   इसलिए  /
आवरण  पर  आवरण
पर  आवरण  ओढे रहे /

Friday, 28 October 2011

कविता

 कोरे   कागज़  पर   कुछ  लिख   कर ,
  मन     हल्का     कर     लेते      हैं  /
  कुछ   शब्दों  को   मिलाजुला कर,
  हम    कविता    लिख    लेते    हैं  /

  कभी    किसी    से    नहीं     कहीं,
  अंतर्मन    में      उठती        बातें   /
  उन    खट्टी     मीठी    बातो      से  ,
  पन्नों     को     भर     लेते       हैं  /

  कुछ   सपने   कुछ    झूठे     वादे,
  हमें     रुला    कर     चले     गए  /
 आँख   पोंछ   कर   बड़े  जतन  से ,
  फिर    सपने    बुन     लेते     हैं  /

  सपने    तो    बस    सपने    होते ,
  सपनो     का     अपना     संसार  /
  और    हकीकत   तेज    धार   सी ,
  लोहे      की       पेनी      तलवार /

  हँसना    रोना    सपने    बुनना ,
  ये     भी     एक     हकीकत   है /
  सपनो   से    ही  साहस  ले  कर ,
  अपना    मन     भर    लेते     हैं  /

   सपने    सच    भी    होते     हैं ,
   ये   बात   हमें   मालूम   तो  हैं /
  लेकिन   इन  नयनो  का   क्या ,
  ये  आँचल   तर्   कर   लेते  हैं /

  सबकी   अपनी  अलग   कहानी ,
  अलग   सभी   की  यहाँ    कथा  /
  चलो   आज  सबकी   झोली  मैं  ,
   ममता   कुछ    भर    देते    हैं  /