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Monday, 19 December 2011

लड़की वाले

मैं   उम्र   भर    लड़ती   रही  ,
बेटा बेटी का अंतर   मिटाने  के लिए |
थाम   कर     हाथ   मे  परचम ,
करती  रही  नेतृत्व   समानता का |
लेकिन  वही  अंतर   खड़ा    है ,
आज मेरे द्वार पर  ढीट  बन के ,
कह रहा है  तुम  लड़की  वाले हो ........

Thursday, 17 November 2011

अंजुरी   मैं  भरे
,तर्पण  के जल जैसा ,
है ये जीवन |
जो टपकता है ,बूंद बूंद ,
नीचे  की ओर  रिसता हुआ |
हर बूंद  एक
साँस  की तरह ,
जो हवा मैं बिखरती है और
हो जाती है विलीन
शून्य  मैं |

टिप टिप गिरती बूंदों  से ,
नजाने कितने
बुझाते है अपनी प्यास |
ले कर तृप्ति
चल देते है अपने अपने रास्ते   |
कोई भी नहीं देखता ,
अंजुरी  का
पलपल ...रीतना ,
जब तक बूंद है ,
तभी  तक है अंजुरी के मायने |
जब खाली हुई तो,
 सब कुछ बेमानी |
वाह रे  ..स्वार्थ
क्या ? तेरा कोई अंत नहीं .....|

Tuesday, 15 November 2011

भरम


मेरी माँ
जीती रही इसी भरम मैं ;
कि उसके बिना ,
बच्चे रह न सकेंगे
अब वो नहीं है |

अब   मैं जी रही हूँ
इसी भरम मैं |
ये सिलसिला
जारी है ,
सदियों से यूँ ही
अनवरत

ज्ञानी  कहते है ,
जगत मिथ्या है |
भरम मत
  पालो
मैं  कहती हूँ
जिस दिन माँ का भरम ,
टूट गया |
उसी दिन जगत का ,
क्षरण प्रारंभ हो जाएगा |
माँ का
भरम है तो संसार है ,
अन्यथा
कुछ भी नहीं |