Thursday, 23 February 2012

जब भोर हुई





जब   भोर    हुई
 सूरज    निकला ,
नभ    मे  फैली
  वो    अरुणाई  |
टेसू   महके ,
,चिडियाँ  चहकें ,
धरती  पर  छाई  तरुनाई |

सर  पर  गागर   ले,
 जल   भरने |
चल   पड़ी  गुजरिया ,
बल   खाती |
ये   शीतल  मंद
पवन  बहती   ,
और   डाल  डाल
 को छू जाती

लो   चाक   चला   ,
कच्ची   मिटटी
लिपटी  कुम्हार   के
हाथों     मे |
आकार  मिला, 
बन  गयी   दिया ,
जलने को
 काली रातों मे |

काँधे   पर  हल
 लेकर  किसान   ,
बैलों    के   बंधन
खोल   रहा  |
बज   रहीं  घंटियाँ
छनन    छनन ,
स्वर  गलियारे   मे
डोल रहा  |

सरसों   की   कलियाँ
झूम  रहीं  ,
पीले   रंग  की
 चादर  ओढ़े |
भवरों की गुनगुन
 स्वर लहरी ,
कानों    मे मीठा  रस  घोले |

सूरज की परछाई  जल मे ,
रंग झिलमिल  झिल मिल
घोल   रही |
सतरंगी  किरने   कानों  मे ,
कुछ  गुपचुप   गुपचुप
बोल   रहीं|

तुम  भाप  बनो
और   उड़  जाओ ,
पहुचो  नभ   की
ऊंचाई    पर  |

फिर  बादल  की
 बौछार  लिए ,
छम   से   बरसो
इस  धरती  पर |

नदियों   मे पानी
तुम  भर दो |
इस   धारा   को
धानी  तुम  कर  दो |
धीरे धीरे  लाओ बसंत,
ये  सुबह  सुहानी
तुम कर दो |

ममता

14 comments:

  1. बहुत बढ़िया,भाव पुर्ण अच्छी प्रस्तुति,.....

    MY NEW POST...आज के नेता...

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  2. भोर का सौन्दर्य और उसके क्रियाकलाप .... बहुत सुन्दर

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  3. नदियों मे पानी
    तुम भर दो |
    इस धारा को
    धानी तुम कर दो |
    धीरे धीरे लाओ बसंत,
    ये सुबह सुहानी
    तुम कर दो |

    भोर की बेला ..और ये सौंदर्य से लदा वर्णन ...मनमोहक ...महक महक रुक गया मन ....!!
    बधाई एवं शुभकामनायें ...ममता जी ....

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  4. सुबह का बहुत भावपूर्ण और सुंदर शब्द चित्र...

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  5. भोर का सुंदर वर्णन ... और सार्थक संदेश देती अच्छी रचना

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  6. कल शनिवार , 25/02/2012 को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .

    धन्यवाद!

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  7. सुन्दर बिम्ब, मन को शान्त कर देने वाले अहसास लिये हुये शब्द.!

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  8. bahut shandar bhor ka chitran kiya hai bahut achcha bimb bana hai rachna me.

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  9. सुंदर चित्रण ....बेहतरीन अभिव्यक्ति.....

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  10. अति सुन्दर, मनभावन व भावपूर्ण कविता... बधाई.

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  11. yadi aap mere dwara sampadit kavy sangrah mein shamil hona chahte hain to sampark karen
    rasprabha@gmail.com

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  12. सरसों की कलियाँ
    झूम रहीं ,
    पीले रंग की
    चादर ओढ़े |
    भवरों की गुनगुन
    स्वर लहरी ,
    कानों मे मीठा रस घोले |

    सुंदर रचना.....

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