Wednesday, 5 March 2014

किनारे

किनारे
 बांधे रहे नदी को
पर ये कभी नहीं कहा .की .
ठहर जाओ
नदी भी बहती रही
छू छू कर उन्हें.....
अपनी बूंदों से
बुझाती रही उनकी प्यास
वैसे प्यासी तो
 वह भी थी
पर किस से कहती ?
नदी
और प्यासी !!
कोई विस्वास करेगा ?

ममता




14 comments:

  1. नदी की प्यास कौन जानेगा !

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  2. नदी न संचय नीर...जो दूसरों को पानी पिलाते हैं...वो अक्सर प्यासे रह जाते हैं...बहुत सुंदर मनोभाव...

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  3. बहुत सुन्दर रचना....

    अनु

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  4. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.03.2014) को "साधना का उत्तंग शिखर (चर्चा अंक-१५४४)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  5. ऐसा ही होता है, पर यकीन कोई नहीं करता....
    कम शब्दों में गहरी बात...

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  6. समेटी रहती है नदी कितना दर्द अपने अंदर ... नदी के माध्यम से मिटना कुछ कह दिया ...

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  7. नदी न संचय नीर जो दूसरों को पानी पिलाते हैं...वो अक्सर प्यासे रह जाते हैं...बहुत सुंदर मनोभाव...

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  8. सुन्दर रचना..

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  9. बहुत प्रभावी और गहन अभिव्यक्ति...

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  10. शायद अक्सर ही यही होता होगा नदी के साथ , कौन देखता है उसकी जरूरतें . . . .
    मंगलकामनाएं !

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  11. आपके लेखन का इंतज़ार रहेगा !

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  12. नदी की प्यास को कौन समझे सिवाय नारी के -------------- सुंदर शब्दों में गहन भावाभिव्यक्ति.

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  13. नदी की प्यास को कौन समझ पाया सिवाय नारी के ....... सुंदर अभिव्यक्ति.

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